वाशिंगटन। भूमध्यरेखा के आसपास रहने वाले लोगों में फैलने वाली बीमारियों के कारणों का पता लगाने में ड्रोन और सेटेलाइट से लिए गए चित्र कारगर साबित हो सकते हैं। यह जानकारी अमेरिकी की यूनिवर्सिटी ऑफ वाशिंगटन के एक नए अध्ययन में दी गई है। दरअसल, शोधकर्ताओं ने इन क्षेत्रों में रहने वाले लोगों में सिस्टोसोमाइसिस का पता करने के लिए ड्रोन और सेटेलाइट की मदद ली और पता लगाया है कि यह बीमारी कैसे लोगों में फैल रही है। शोधकर्ताओं का दावा है कि इसके जरिये हम बीमारियों को बढ़ने से रोक सकेंगे। सिस्टोसोमाइसिस एक परजीवी जनित रोग है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक यह मलेरिया के बाद सबसे ज्यादा फैलने वाली बीमारी है। अफ्रीकी देशों में इसका सबसे ज्यादा असर देखा जाता है। इस बीमारी का परजीवी खास तौर से सदाबहार और वर्षा वनों के आस- पास रहने वाले समुदायों को निशाना बनाता है क्योंकि इन क्षेत्रों में सुबह से दोपहर तक तेज धूप और शाम होते-होते तेज बारिश होती है। ऐसी जलवायु में सिस्टोसोमाइसिस का परजीवी अन्य जीवों की मदद से आसानी से पनप जाता है। घने जंगलों के कारण इससे प्रभावित इलाकों की पहचान करना भी कठिन होता है। नए अध्ययन में अमेरिकी शोधकर्ताओं ने दावा किया है कि यदि ड्रोन, सेटेलाइट और गूगल अर्थ के जरिये ऐसे क्षेत्र चिह्नित किए जाएं तो यह अनुमान लगाना आसान हो जाएगा कि भूमध्यरेखा के आसपास सिस्टोसोमाइसिस कैसे फैल रहा है? इसके लिए शोधकर्ताओं ने उन क्षेत्रों के नमूने लेने के लिए फील्ड सैंपलिंग और हवाई चित्रों का उपयोग किया, जहां सिस्टोसोमाइसिस का खतरा सबसे ज्यादा रहता है। शोधकर्ताओं ने कहा, 'इस दौरान उन्हें वातावरण में कई सुराग मिले, जो ऐसे हॉटस्पॉट की पहचान करने में मदद कर सकते हैं।'पीएनएसी नामक जर्नल में प्रकाशित अध्ययन में बताया गया है कि विश्व में 20 करोड़ से ज्यादा लोग सिस्टोसोमाइसिस से पीड़ित हैं। इसका इलाज किया जा सकता है पर दुनिया के कुछ हिस्सों से इसे पूरी तरह खत्म नहीं किया जा सकता।
सिस्टोसोमाइसिस का परजीवी ताजे पानी में घोंघे के भीतर विकसित होते हैं और इनके जरिये नदियों, झीलों और तालाबों में फैल जाते हैं। यदि कोई इस पानी के संपर्क में आता है तो ये परजीवी उसकी त्वचा को भेद कर शरीर में प्रवेश कर जाते हैं।'
जिस व्यक्ति के शरीर में सिस्टोसोमाइसिस का परजीवी प्रवेश कर जाता है, उसका मूत्र (यूरिन) मार्ग और आंतें संक्रमित हो जाती हैं। इसके अलावा उसे पेट दर्द, डायरिया, खूनी पेचिस शुरू हो जाते हैं। यह लिवर और किडनी को खराब कर देता है। कई बार तो यह बांझपन का भी कारण बन जाता है। इससे प्रभावित बच्चों की शारीरिक वृद्धि तक रुक जाती है।यूनिवर्सिटी ऑफ वाशिंगटन के शोधकर्ता चेल्सी वुड ने कहा, 'इस अध्ययन के लिए उन्होंने अफ्रीका के उत्तर-पूर्वी सेनेगल की उन 30 साइटों पर काम शुरू किया, जहां के ग्रामीण स्थानीय नदी- तालाबों के पानी से सीधा संपर्क में रहते थे।अध्ययन के दौरान शोधकर्ताओं ने दो साल तक इस क्षेत्र में सेटेलाइट और ड्रोन के जरिये घोंघे के वितरण की मैपिंग की। इस दौरान शोधकर्ताओं ने पाया कि जिस स्थान पर उन्हें घोंघे मिले थे तीन माह बाद उन इलाकों से घोंघे गायब हो गए थे, जिसका मतलब है कि घोंघे हमेशा गतिशील रहते हैं। वुड ने कहा, 'यदि हम ऐसे इलाकों की मैंपिंग कर लेते हैं तो काफी हद तक हम सिस्टोसोमाइसिस को फैलने से रोक सकते हैं।'